आत्मसाक्षात्कार का रहस्य - २
- यु जी कृष्णमुर्ती
आत्मसाक्षात्कार, मुक्ती, ज्ञानप्राप्ति आदि घटनाये आपके किसी भी प्रयास से प्राप्त नहीं कि जा सकती है; अचानक होती है। और एक व्यक्ति के लिए ऐसा होता है तो और दूसरे व्यक्ति के साथ क्यों नहीं, यह मुझे नहीं पता।
प्रश्नकर्ता: यह आपके साथ कभी हुआ।
युजी: मै ४९ साल का था तभी यह मेरे साथ हुआ था।
हम हमेशा अपने खुद के स्वाभाविक प्रकृतीक अवस्था मे रहते हैं। लेकिन खोज, सच्चाई या सच्चाई की खोज जो कुछ भी आप उसके प्राप्ती के लिये कर रहे हैं वह आप को स्वयं से दूर ले जाते हैं। ईसलिये यह अवस्था पाने के लिये कुछभी करना गलत है। यह एैसा कुछ नहि है जो आप कुछ करके प्राप्त कर सकते हैं, या अपने प्रयासों के परिणाम स्वरूप पूरा कर सकते है। यही कारण है कि मैं ईसके लिये 'अकारण' शब्द का प्रयोग करता हूं, इसका कोई कारण नहीं है, लेकिन किसी तरह हमारी सत्य कि खोज हमेशा के लिये समाप्त हो जाती है।
प्रश्न: महोदय, आपको सचमुच लगता है कि यह किसी खोज का नतीजा नहीं है? मैं ईसलिये यह पूछता हूं क्योंकि मैंने सुना है कि आपने दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया है, और आप धार्मिक लोगों से जुड़े हुये थे।
युजी: हां, मैने यह अवस्था प्राप्त करने के लिये सबकुछ किया था। बचपनमे मुझे धार्मिक वातावरण मे रखा गया था, वैदिक शिक्षा मिली थी, पैसोंकि कोई कमी नहि थी ईसलिये केवल आत्मसाक्षात्कार के पिछे मै पडा था। देश विदेशोंके अच्छे अच्छे गुरूओंके साथ रहता था। लेकिन ऊससे कुछ नहि हो रहा था। मेरी वह खोज मुझे विपरीत दिशा मे दूर ले गयी थी। साधना और साक्षात्कार का एकदुसरेसे बिल्कुल संबंध नहीं है।
प्रश्न: साधनाके बावजूद, ऐसा हुआ है, साधनाकी वजह से नहीं?
युजी: साधनाके बावजूद, हाँ, यह सहि शब्द है। जो भी साधना आप करते हैं वह साधना साक्षात्कार को या स्वयं को व्यक्त करने के लिए जो पहले से ही मौजुद है असंभव बनाती है । यही कारण है कि मैं इसे 'अपनी प्राकृतिक अवस्था' कहता हूं । क्योंकि हम हमेशा ईस स्थिति में हि रहते हैं । हमारी खोज ईस स्थिती को खुद को अपने तरीके से व्यक्त करने से रोकती है।
हमारी खोज हमेशा हमे गलत दिशा में ले जाती है। इसलिए आप जिसको गहरा ज्ञान समजते हो या जिसे भी आप पवित्र मानते हैं, वह सब हमारी चेतनामे किया हुआ प्रदुषण मात्र है। आपको शायद 'चेतना का प्रदुषण' यह शब्द अच्छा नहि लगेगा लेकिन यकिन मानो आप जिसे धार्मिक, पवित्र, शुध्द मानते है वह सब प्रदुषित है। प्राकृतीक अवस्थामे मिलावट का मतलब प्रदुषण है।
ऐसा कुछ नहीं है जो आप कर सकते हैं यह चिज आपके हाथों में नहीं है । मैं 'अनुग्रह' शब्द का उपयोग करना भी पसंद नहीं करता, क्योंकि यदि आप 'अनुग्रह' शब्द का उपयोग करते हैं, तो किसका अनुग्रह? अगर मेरे लिए यह संभव होता, तो मैं किसी की मदद करने में, अनुग्रह करने मे सक्षम होता। यह ऐसा कुछ है जो मैं या दुसरा कोई किसीको नहीं दे सकता, क्योंकि आपके पास वह पहलेसे हि मौजुद है। मैं आपको इसे कैसे दे दूँ? ऐसी चीज़ की पूछना हास्यास्पद है जो आपके पास पहले से है। अनुग्रह करना यह सरासर झुठ है, नामुमकिन है। खुदको गुरू बनाकर शिष्योंका शोषण करने के लिये एैसा किया जाता है। ईसके लिये कोई विशेष रूप से चुने हुये व्यक्ति कि जरूरत नहीं हैं। यह किसी के साथ भी हो सकता है।
प्रश्न: लेकिन मुझे यह महसुस नहीं होता, और आपको ऐसा महसुस होता हैं।
युजी: नहीं, आप यह कभी महसूस नहि कर सकते या ईसे जान सकते है; आपको कभी ईसका पता नहीं चलेगा। आपके पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है । वह अवस्था खुद को व्यक्त करने के लिए जब शुरू होती है तभी महसुस होना चालु होता है। लेकिन मै आपसे अलग हुं या विशेष हुं यह विचार मुझे कभी आता नहि है।
- यु जी कृष्णमुर्ती
आत्मसाक्षात्कार, मुक्ती, ज्ञानप्राप्ति आदि घटनाये आपके किसी भी प्रयास से प्राप्त नहीं कि जा सकती है; अचानक होती है। और एक व्यक्ति के लिए ऐसा होता है तो और दूसरे व्यक्ति के साथ क्यों नहीं, यह मुझे नहीं पता।
प्रश्नकर्ता: यह आपके साथ कभी हुआ।
युजी: मै ४९ साल का था तभी यह मेरे साथ हुआ था।
हम हमेशा अपने खुद के स्वाभाविक प्रकृतीक अवस्था मे रहते हैं। लेकिन खोज, सच्चाई या सच्चाई की खोज जो कुछ भी आप उसके प्राप्ती के लिये कर रहे हैं वह आप को स्वयं से दूर ले जाते हैं। ईसलिये यह अवस्था पाने के लिये कुछभी करना गलत है। यह एैसा कुछ नहि है जो आप कुछ करके प्राप्त कर सकते हैं, या अपने प्रयासों के परिणाम स्वरूप पूरा कर सकते है। यही कारण है कि मैं ईसके लिये 'अकारण' शब्द का प्रयोग करता हूं, इसका कोई कारण नहीं है, लेकिन किसी तरह हमारी सत्य कि खोज हमेशा के लिये समाप्त हो जाती है।
प्रश्न: महोदय, आपको सचमुच लगता है कि यह किसी खोज का नतीजा नहीं है? मैं ईसलिये यह पूछता हूं क्योंकि मैंने सुना है कि आपने दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया है, और आप धार्मिक लोगों से जुड़े हुये थे।
युजी: हां, मैने यह अवस्था प्राप्त करने के लिये सबकुछ किया था। बचपनमे मुझे धार्मिक वातावरण मे रखा गया था, वैदिक शिक्षा मिली थी, पैसोंकि कोई कमी नहि थी ईसलिये केवल आत्मसाक्षात्कार के पिछे मै पडा था। देश विदेशोंके अच्छे अच्छे गुरूओंके साथ रहता था। लेकिन ऊससे कुछ नहि हो रहा था। मेरी वह खोज मुझे विपरीत दिशा मे दूर ले गयी थी। साधना और साक्षात्कार का एकदुसरेसे बिल्कुल संबंध नहीं है।
प्रश्न: साधनाके बावजूद, ऐसा हुआ है, साधनाकी वजह से नहीं?
युजी: साधनाके बावजूद, हाँ, यह सहि शब्द है। जो भी साधना आप करते हैं वह साधना साक्षात्कार को या स्वयं को व्यक्त करने के लिए जो पहले से ही मौजुद है असंभव बनाती है । यही कारण है कि मैं इसे 'अपनी प्राकृतिक अवस्था' कहता हूं । क्योंकि हम हमेशा ईस स्थिति में हि रहते हैं । हमारी खोज ईस स्थिती को खुद को अपने तरीके से व्यक्त करने से रोकती है।
हमारी खोज हमेशा हमे गलत दिशा में ले जाती है। इसलिए आप जिसको गहरा ज्ञान समजते हो या जिसे भी आप पवित्र मानते हैं, वह सब हमारी चेतनामे किया हुआ प्रदुषण मात्र है। आपको शायद 'चेतना का प्रदुषण' यह शब्द अच्छा नहि लगेगा लेकिन यकिन मानो आप जिसे धार्मिक, पवित्र, शुध्द मानते है वह सब प्रदुषित है। प्राकृतीक अवस्थामे मिलावट का मतलब प्रदुषण है।
ऐसा कुछ नहीं है जो आप कर सकते हैं यह चिज आपके हाथों में नहीं है । मैं 'अनुग्रह' शब्द का उपयोग करना भी पसंद नहीं करता, क्योंकि यदि आप 'अनुग्रह' शब्द का उपयोग करते हैं, तो किसका अनुग्रह? अगर मेरे लिए यह संभव होता, तो मैं किसी की मदद करने में, अनुग्रह करने मे सक्षम होता। यह ऐसा कुछ है जो मैं या दुसरा कोई किसीको नहीं दे सकता, क्योंकि आपके पास वह पहलेसे हि मौजुद है। मैं आपको इसे कैसे दे दूँ? ऐसी चीज़ की पूछना हास्यास्पद है जो आपके पास पहले से है। अनुग्रह करना यह सरासर झुठ है, नामुमकिन है। खुदको गुरू बनाकर शिष्योंका शोषण करने के लिये एैसा किया जाता है। ईसके लिये कोई विशेष रूप से चुने हुये व्यक्ति कि जरूरत नहीं हैं। यह किसी के साथ भी हो सकता है।
प्रश्न: लेकिन मुझे यह महसुस नहीं होता, और आपको ऐसा महसुस होता हैं।
युजी: नहीं, आप यह कभी महसूस नहि कर सकते या ईसे जान सकते है; आपको कभी ईसका पता नहीं चलेगा। आपके पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है । वह अवस्था खुद को व्यक्त करने के लिए जब शुरू होती है तभी महसुस होना चालु होता है। लेकिन मै आपसे अलग हुं या विशेष हुं यह विचार मुझे कभी आता नहि है।

No comments:
Post a Comment