आत्मसाक्षात्कार का मतलब है मन का अंत, विचारहिन अवस्था। विचारोंके अभाव से शरीरकि सभी संवेदी गतिविधियों स्वतंत्ररूपसे चलनी लगती है। विभिन्न गतिविधियों को जोड़ने वाला मन जैसा कोई समन्वयक नहीं रहने से बहुत मुश्किलोंका सामना करना पडता है। ज्ञान, जानकारी होते हुये भी ऊन्हे जोडनेवाली यंत्रणा कि अभाव से बच्चो जैसे हर चिज के बारे मे पुछना पडता है, यह क्या है, वह क्या है। बिना विचार के, बिना मन के और बिना ज्ञान के जिवन सहज नैसर्गिक हो जाता है, सब कुछ चलता रहता है लेकिन आस पास के लोग परेशान होते है। ऊन्हे लगता है शायद यह पागल हो गया है। लेकिन पता चलता था कि वास्तव में अंदर बहुत कुछ शानदार हो रहा है - वह क्या हो रहा है, कुछ नहीं पता था, लेकिन उसने मुझे परेशान नहीं किया।
जब मैं कुछ देखता रहता हूं, तो मैं वास्तवमें नहीं जानता कि मैं क्या देख रहा हूं - यही कारण है कि मैं कहता हूं कि यह 'न जानने' की अवस्था है। मैं सच में नहीं जानता।
जब आप सौभाग्य के वजह से, या कुछ अजीब मौकेकि वजह से आप ऊस अवस्था मे वहां होते हैं, तब से हर चीज अपने तरीके से होती है।
ऊस अवस्था मे आप हमेशा समाधि की स्थिति में होते हैं। समाधि मे जाने का और समाधि से बाहर आने का कोई सवाल ही नहीं होता है। आप हमेशा ऊस अवस्था मे होते हैं । मैं समाधि शब्द का उपयोग नहीं करना चाहता, लेकिन और कोई शब्द नहि है इसलिए मैं कहता हूं कि वह कुछ जानने की स्थिति नहीं है। आपके शरिर को जब किसी जानकारी कि जरूरत पडती है तभी वह जानकारी आपके सामने आती है और काम होने के बाद वह जानकारी निकल जाती है।
जब मैं कुछ देखता रहता हूं, तो मैं वास्तवमें नहीं जानता कि मैं क्या देख रहा हूं - यही कारण है कि मैं कहता हूं कि यह 'न जानने' की अवस्था है। मैं सच में नहीं जानता।
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ऊस अवस्था मे आप हमेशा समाधि की स्थिति में होते हैं। समाधि मे जाने का और समाधि से बाहर आने का कोई सवाल ही नहीं होता है। आप हमेशा ऊस अवस्था मे होते हैं । मैं समाधि शब्द का उपयोग नहीं करना चाहता, लेकिन और कोई शब्द नहि है इसलिए मैं कहता हूं कि वह कुछ जानने की स्थिति नहीं है। आपके शरिर को जब किसी जानकारी कि जरूरत पडती है तभी वह जानकारी आपके सामने आती है और काम होने के बाद वह जानकारी निकल जाती है।
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