Sunday, February 11, 2018

निरिच्छावस्था हिच मुक्तावस्था आहे

|| भगवद गिता 15.3 Bhagwat Gita ||


न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।

या अधोमुखी संसारवृक्षाचा आकार, आदि, अंत, मध्याचा पार लागु शकत नाहि. केवळ निरिच्छावस्था हिच त्यामधुन बाहेर पडण्याचा मार्ग आहे. केवळ नातलग, अर्थ, लोकसंग्रह आदि सुखांच्या ईच्छेमधुनच नव्हे तर स्वर्गप्राप्ती, ईश्वरप्राप्ति वा मोक्षप्राप्ती या सर्व ईच्छाप्राप्तींच्या अभिलाषांमधुन निवृत्त होणे हेच अंतीम ऊद्दिष्ट असायला हवे.

The world's form is not perceived here as such, neither its end nor its origin, nor its foundation nor resting place: having cut asunder this firmly rooted peepul tree with the strong axe of non-attachment.

यह जो संसारवृक्ष है इसका ऊलटा स्वरूप जैसा यहाँ वर्णन किया गया है वैसा दिखाई नहि देता क्योंकि यह स्वप्नकी वस्तु मृगतृष्णाके जल और मायारचित गन्धर्वनगरके समान होनेसे देखतेदेखते नष्ट होनेवाला है। इसी कारण इसका अन्त अर्थात् अन्तिमावस्था अवसान या समाप्ति भी नहीं है। तथा इसका आदि भी नहीं है अर्थात् कहाँसे आरम्भ होकर यह संसार चला है ऐसा किसीसे नहीं जाना जा सकता और इसकी संप्रतिष्ठास्थिति भी नहीं है यानी आदि और अन्तके बीचकी अवस्था भी किसीको उपलब्ध नहीं होती। इसकी मूलें -- जड़ें अत्यन्त दृढ़ हो गयी हैं -- भली प्रकार संगठित हो चुकी हैं। ऐसे संसाररूप अश्वत्थको असङ्गशस्त्रसे छेदन करके यानी पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणादिसे उपराम हो जाना ही असङ्ग है। ऐसे असङ्गशस्त्रसे जो कि परमात्माके सम्मुख होना, निश्चयसे दृढ़ किया हुआ है और बारंबार विवेकाभ्यासरूप पत्थरपर घिसकर पैना किया हुआ है।

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