Monday, November 30, 2020

दृष्टा और दृश्य एक है, कैसे?

द्रष्टा का मतलब है देखने वाला, अनुभव करने वाला और जो भी चीज हम अनुभव करते है वह दृश्य है। 

दृष्टा को ही हम मै, माय सेल्फ, मी ऐसे कहते हैं। Myself, Me, मै का मतलब है हमारा पूर्व ज्ञान, हमारा भूतकाल, हमारी सारी पूर्व स्मृतिया। यह सब हमारे दिमाग में विचारों के माध्यम से संग्रहित किया जाता है। यानी कि मै जो दृष्टा हूं वह असल में सिर्फ विचार मात्र है।

ज्ञानिंद्रियोंसे हमारा शरीर जो भी अनुभव करता है उसे हम दृश्य कहते है। पूर्व अनुभव हो या वर्तमान के अनुभव हो वह सब हमारे दिमाग कि स्मृतियों में संग्रहित किया जाता है। संग्रहित होने के बाद उस अनुभव कि जो प्रतिक्रिया उठती है उससे हमने अनुभव क्या किया यह समझ में आता है। अनुभव कि जो प्रतिक्रिया होती है वह भी विचार मात्र ही हैl

इसी तरह दृष्टा भी विचार है और दृश्य भी विचार है, दोनों एक है।

जब हमें लगता था कि दृष्टा और दृश्य अलग-अलग है, इस को हम division कहते हैं और जहां division होती है वहां conflict जरूर होता है। यह division हमारे मन में होती है, वहीं division हमारे परिवार और समाज में भी होती है। यही division सभी संबंधों मै दरारें पैदा कर देती है। इसी division से धर्म और nationalisms के नाम पर wars होते रहते है। हमारे relationships में जो हमारे एक दूसरे के बारे में पूर्व अनुभव है वह divisive knowledge हमारे relationships में दरार पैदा कर देती है। 

मुक्ति का मतलब है पूर्ण स्वतंत्रता, मुक्ति का मतलब है हमारे स्मृतियां में संग्रह किए हुए पुराने विचारों से छुटकारा, पुराने knowledge से मुक्ति, मुक्ति का मतलब है freedom from all that we know, freedom from the known।

मुक्ति का अर्थ है साक्षी का न होना। स्वतंत्रता का अर्थ है साक्षी की सम्पूर्ण उपेक्षा करना। साक्षी विभाजन का केंद्रबिंदु है। साक्षी मै और दूसरा ऐसे विभाजन को बनाता है। इसी विभाजन हेतु रिश्तों के बीच टकराव पैदा होती है। इसलिए सभी रिश्ते हिंसक हैं।  साक्षी का यह विभाजन दुनिया भर में सभी प्रकार के संबंधों में हिंसा और गड़बड़ी पैदा करता है। जब कोई यह सत्य देखता है तो वह विभाजन बनाना बंद कर देता है।

जब हमें इसी तरह मैं का पता लगता है, दृष्टा और दृश्य का पता लगता है तो उससे जो प्रतिभा, जो विवेक जागृत होता है और उससे जो action निकलती है वह सही तरह से नई creation होगी। यह जो नई action और नई activity होगी, हमारा नया बर्ताव होगा वह real meditation है। हजारों सालों से चली आती रही जो परंपरा और उसके साधना मार्ग है वह सब पुराने है, वह सभी हमारे मन को समोहित करके हमें believer बनाते हैं। 

Truth is not to believe, not to search but to live with it.

https://youtu.be/xvVL3tT5hZM


Friday, November 27, 2020

क्या परंपराएं सत्य का विश्वासघात करती हैं?

इंसानों ने भौतिक दुनिया को पूर्व और पश्चिम के रूप में विभाजित किया है।  हमने ईसाई धर्म और हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध धर्मों में इंसानियत को विभाजित किया है। हमने दुनिया को राष्ट्रीयताओं में विभाजित किया है।  हमारे पास पूंजीवादी और समाजवादी, कम्युनिस्ट और अन्य लोग हैं, और इसी तरह हमने दुनिया को बांटा है;  हमने खुद को हिन्दू और गैर-हिन्दू के रूप में विभाजित किया है। हमने एक-दूसरे का विरोध करते हुए खुद को टुकड़ों में बांट लिया है। और जहां विभाजन है वहां संघर्ष है। हमने अपनी सुरक्षा हेतु विभाजन किया था लेकिन विभाजन से ही हम असुरक्षित हो रहे हैं। जिसको यह बात समझ में आएगी वह विभाजन को नकार देगा। जो ज्ञान मानव संस्कृति को अच्छा बनाने के लिए बनाया गया था वह काम नहीं कर पाया है। 

हम सभी इस विभाजन और संघर्ष के लिए जिम्मेदार है। यही विभाजन और संघर्ष हमारे घर के अंदर भी है और हमारे मन के अंदर भी है। समुंदर का विशाल जल और एक बूंद का छोटा जल एक ही है, उसी तरह सम्पूर्ण मानव जाती एक है और उनके सुख और दुख की कल्पनाएं भी एक जैसी ही है। 

हर एक इंसान अपने दुख दर्द से छुटकारा पाने के लिए और सुख पाने के लिए हमेशा बाहर की तरफ देखता है। उसे लगता है कि उसका परिवार, उसका समाज, उसका मार्गदर्शक गुरु या स्वर्ग के देवी देवता उसे दुख मिटाने के लिए और सुख पाने के लिए मदद करेगी। हम सब की यही धारणा है। यही धारणा हमें यह मानने को या स्वीकार करने को राजी नहीं करती कि हमारे दुख दर्द मिटाने के लिए हमें खुद प्रयत्न करना चाहिए, हम खुद अपने दुख दर्द मिटा सकते हैं और सुख पा सकते हैं। और जब इसी तरह हर एक इंसान खुद बदल जाता है, पूर्ण स्वतंत्र हो जाता है तो समाज बदल जाता है। इंसान से समाज बनता है तो इंसान ही समाज को बदल सकता है ना कि समाज इंसान को बदल सकता है।


मानवता के अंदर दुख दर्द है और उसे मिटाने की हर एक कि जिम्मेदारी है न केवल सरकार या नेतागण कि यह जिम्मेदारी है। धीरे धीरे किया हुआ विकास से नहीं और खूनी हिंसक क्रांति से भी नहीं बल्कि मनुष्यों के मनोविज्ञान में क्रांति लाकर हम मनुष्य और पूरी मानव जाति को बदल सकते है । मूलभूत बदल अंदर से ही होंगे और जो अंदर होगा वहीं बाहर भी होगा। लेकिन क्या हजारों सालों से विभाजन और संघर्ष से सम्मोहित किया गया मानवी मन बदलने को तैयार होगा?

मानवता के इस मूलभूत बदलाव के लिए कौनसा ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा?

ज्ञान का मतलब है पूर्व अनुभव। ज्ञान हमेशा भूतकाल का ही होगा वर्तमान का नहीं हो सकता है। हम हमारे भूतकाल के अनुभव से वर्तमान को अनुभव करते रहते है, इसलिए हम वर्तमान को भी भूतकाल में बदल देते है और इसलिए हम पहले जैसे थे वैसे ही रहते है। परम्परायें हमेशा भूतकाल की होती हैं और वे वर्तमान का विश्वासघात करती रहती हैं। हमारा मानव जाती का समूचा ज्ञान जो भूतकाल है वह हमेशा वर्तमान का यानी के सत्य का विश्वासघात करता रहता है। हमारा दिमाग पुराने अनुभव के साथ भावनाए भी संग्रहित करता है जिससे हम वर्तमान को ठीक से समज नहीं पाते हैं।

क्या हम भूतकाल के अनुभव और भूतकाल के ज्ञान और भूतकाल की परम्पराओं से छुटकारा पा सकते है? जिस इंसान को सत्य को पाना है उसे हमारे सभी संप्रदाय, सभी परंपराएं, सभी धर्म को त्यागना अनिवार्य होता है। यह सभी परंपराएं अन्धकार के निदर्शक है और सत्य को ढूंढने वाला स्वयं प्रकाशी होगा, प्रकाश उसका खुद का होगा।

- J Krishnmurti in conversation with Dr Anderson


https://youtu.be/ux-1aRB8Res

Wednesday, November 04, 2020

परम अवस्थेचे दिशा दिग्दर्शन

हजारो वर्षापासून परंपरा आणि श्रद्धा यामध्ये बद्ध झालेला जीव त्यातून मुक्त होऊ शकतो काय?

परंपरा आणि श्रद्धा हे आपल्या मेंदूमध्ये घट्ट पणे पाय रोवून बसलेल्या आहेत. त्यांना कॉन्शसनेस म्हणजे चैतन्य यांनी बांधून ठेवलेले आहे त्यामुळे प्रथम आपण या चैतन्याचा विचार करू या.

चैतन्य म्हणजे नेमके काय आहे?

चैतन्य हे मेंदूमधील स्मृतींचे बनलेले असते. स्मृती मधील आपल्या ज्या आठवणी असतात त्या आठवणींचे सतत उजळणी करत राहणे हे चैतन्याचे काम असते. भूतकाळातील आठवणी मध्ये सतत रममाण होण्यामुळे आपला मेंदू हा जुनाच राहतो त्याच्या मध्ये नाविन्य निर्माण होत नाही. मेंदूमधील जुन्या विचारांनी आपल्या जीवनामध्ये दुःख निर्माण होत असते, माणसा माणसांमध्ये दरी निर्माण होत असते.

आपल्या मेंदूमध्ये असणाऱ्या जुनाट विचारांचा त्याग केला तर साहजिक त्या विचारावर आधारित माणसा माणसा मधील दरी कमी होईल, आपले दुःख कमी होईल. व्यावहारिक विचार कायम ठेवून मानसिक विचारांचा त्याग करता येऊ शकतो.

आपल्या श्रद्धा आणि परंपरा या हजारो वर्षापासून बनले गेले आहेत आणि या हजारो वर्षांच्या श्रद्धा वरून आपले विचार बनले गेले आहेत या विचारांचा अंत करायचा म्हणजे परत तेवढेच वर्षे जाऊन द्यावे लागतील. भूतकाळ मध्ये गेलेला वेळ आणि आणि भविष्य काळामध्ये त्यांना घालवण्यासाठी लागणारा वेळ हे सर्व वेळकाढू पणा आहे आणि ते अशक्य सुद्धा आहे मग यावर इतर कोणता मार्ग आहे का?

जुन्या विचारांचा आधार काढून घेऊन त्याठिकाणी नवीन विचारांचा शिरकाव होऊन देण्यामध्ये खूप मोठा धोका असते कारण आपला मेंदू सुरक्षित जीवन जगण्याच्या कल्पनांमधून जे त्याला सुरक्षा देत असते ते सोडायला तयार होत नाही आणि जे नवीन आहे ते मला सुरक्षा देईल काय? या शंकेने नवीन स्वीकारायला तयार होत नाही. ज्या मेंदूस सुरक्षित आणि सुखी जीवन जगायचे आहे आहे तो असा धोका घेऊ शकत नाही. केवळ असे जिज्ञासू ज्यांना जीवन हे मानसिकरीत्या सुरक्षित आणि सुखी नसते ते निसर्ग नियमांनी संरक्षित आहे हे कळलेले असते असे मेंदूच नवीन धोका घ्यायला तयार होतात. ज्यांनी जीवनामध्ये अपार संकटांचा सामना केला आहे, अपार दुःख भोगले आहे असे मेंदू त्यांच्या अनुभवातून धोका घेण्यास प्रवृत्त झालेले असतात.

आपल्या सर्व प्रकारच्या मानसिक विचारसरणीचा अंत हा आपल्या खऱ्या खुऱ्या अस्तित्वाशी एकरूप होणे होय. अशा अवस्थेमध्ये प्रस्थापित होणे होय जी अवस्था सर्व इतर अवस्थांचे मूळ स्थान असेल.

अशा परम अवस्थेमध्ये येण्यासाठी काय करावे लागेल? कोणतीही मानसिक क्रिया आपणास त्या अवस्थेत येऊ देणार नाही. फक्त अशी जाणीव खूप महत्वाची आहे की आपण परंपरागत, श्रद्धाळू जीवन जगत आहोत, त्यांच्या बंधनातील जीवन जगत आहोत, त्या श्रद्धा आपणास सत्याकडे फिरकू देत नाहीत अशा प्रकारे आपल्या कृत्रिम, बनावट परंपरागत, श्रद्धाळू जीवनशैलीचे निरीक्षण करीत त्यातील कृत्रिमपण कमी करावे लागेल, संपवावे लागेल. बहुसंख्य लोक परंपरा आणि श्रद्धा यांच्या मगरमिठीत पूर्णपणे अडकले आहेत, त्यांचे सर्व प्रयत्न त्यांना त्या दलदली मध्ये अधिकाधिक अडकवित आहेत. आपण त्या श्रद्धा, परंपरा रुपी मगरीचे शिर कलम करण्यासाठी कोणीतरी गरुडावर बसून येईल असे श्रद्धा सांगतात त्यावर विश्वास ठेवून स्वतः काही न करता वाट पहात असतो आणि मगरीचे शिकार होत राहतो. आपले जीवन हे मानसिक श्रद्धा रुपी मगरींचे जाळे आहे हे लक्षात येणे हे अतिशय महत्वाचे आहे. 

- J Krishnamurti आणि पुपुल जयकर यांच्या मधील गहन चिंतन

https://youtu.be/LjNsrVHbctU