इंसानों ने भौतिक दुनिया को पूर्व और पश्चिम के रूप में विभाजित किया है। हमने ईसाई धर्म और हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध धर्मों में इंसानियत को विभाजित किया है। हमने दुनिया को राष्ट्रीयताओं में विभाजित किया है। हमारे पास पूंजीवादी और समाजवादी, कम्युनिस्ट और अन्य लोग हैं, और इसी तरह हमने दुनिया को बांटा है; हमने खुद को हिन्दू और गैर-हिन्दू के रूप में विभाजित किया है। हमने एक-दूसरे का विरोध करते हुए खुद को टुकड़ों में बांट लिया है। और जहां विभाजन है वहां संघर्ष है। हमने अपनी सुरक्षा हेतु विभाजन किया था लेकिन विभाजन से ही हम असुरक्षित हो रहे हैं। जिसको यह बात समझ में आएगी वह विभाजन को नकार देगा। जो ज्ञान मानव संस्कृति को अच्छा बनाने के लिए बनाया गया था वह काम नहीं कर पाया है।
हम सभी इस विभाजन और संघर्ष के लिए जिम्मेदार है। यही विभाजन और संघर्ष हमारे घर के अंदर भी है और हमारे मन के अंदर भी है। समुंदर का विशाल जल और एक बूंद का छोटा जल एक ही है, उसी तरह सम्पूर्ण मानव जाती एक है और उनके सुख और दुख की कल्पनाएं भी एक जैसी ही है।
हर एक इंसान अपने दुख दर्द से छुटकारा पाने के लिए और सुख पाने के लिए हमेशा बाहर की तरफ देखता है। उसे लगता है कि उसका परिवार, उसका समाज, उसका मार्गदर्शक गुरु या स्वर्ग के देवी देवता उसे दुख मिटाने के लिए और सुख पाने के लिए मदद करेगी। हम सब की यही धारणा है। यही धारणा हमें यह मानने को या स्वीकार करने को राजी नहीं करती कि हमारे दुख दर्द मिटाने के लिए हमें खुद प्रयत्न करना चाहिए, हम खुद अपने दुख दर्द मिटा सकते हैं और सुख पा सकते हैं। और जब इसी तरह हर एक इंसान खुद बदल जाता है, पूर्ण स्वतंत्र हो जाता है तो समाज बदल जाता है। इंसान से समाज बनता है तो इंसान ही समाज को बदल सकता है ना कि समाज इंसान को बदल सकता है।
मानवता के अंदर दुख दर्द है और उसे मिटाने की हर एक कि जिम्मेदारी है न केवल सरकार या नेतागण कि यह जिम्मेदारी है। धीरे धीरे किया हुआ विकास से नहीं और खूनी हिंसक क्रांति से भी नहीं बल्कि मनुष्यों के मनोविज्ञान में क्रांति लाकर हम मनुष्य और पूरी मानव जाति को बदल सकते है । मूलभूत बदल अंदर से ही होंगे और जो अंदर होगा वहीं बाहर भी होगा। लेकिन क्या हजारों सालों से विभाजन और संघर्ष से सम्मोहित किया गया मानवी मन बदलने को तैयार होगा?
मानवता के इस मूलभूत बदलाव के लिए कौनसा ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा?
ज्ञान का मतलब है पूर्व अनुभव। ज्ञान हमेशा भूतकाल का ही होगा वर्तमान का नहीं हो सकता है। हम हमारे भूतकाल के अनुभव से वर्तमान को अनुभव करते रहते है, इसलिए हम वर्तमान को भी भूतकाल में बदल देते है और इसलिए हम पहले जैसे थे वैसे ही रहते है। परम्परायें हमेशा भूतकाल की होती हैं और वे वर्तमान का विश्वासघात करती रहती हैं। हमारा मानव जाती का समूचा ज्ञान जो भूतकाल है वह हमेशा वर्तमान का यानी के सत्य का विश्वासघात करता रहता है। हमारा दिमाग पुराने अनुभव के साथ भावनाए भी संग्रहित करता है जिससे हम वर्तमान को ठीक से समज नहीं पाते हैं।
क्या हम भूतकाल के अनुभव और भूतकाल के ज्ञान और भूतकाल की परम्पराओं से छुटकारा पा सकते है? जिस इंसान को सत्य को पाना है उसे हमारे सभी संप्रदाय, सभी परंपराएं, सभी धर्म को त्यागना अनिवार्य होता है। यह सभी परंपराएं अन्धकार के निदर्शक है और सत्य को ढूंढने वाला स्वयं प्रकाशी होगा, प्रकाश उसका खुद का होगा।
- J Krishnmurti in conversation with Dr Anderson
https://youtu.be/ux-1aRB8Res
